Thursday, February 26, 2015

Article on Shri Dadu Dayal Ji Maharaj Jayanti

संतप्रवर श्री दादू दयाल जी महाराज की जयंती पर विशेष
"धन्य धन्य गुरु दादूरामा, भक्तन हितकारक अभिरामा"

भारतवर्ष के गुजरात राज्य में अहमदाबाद के निवासी श्री लोधीरम नागर एक धनी यशस्वी व्यापारी थे अधेड़ आयु के उपरांत भी उनके पुत्र नहीं था जिसकी उन्हें सदा लालसा रहती थी एक दिन उन्हें एक सिद्ध संत के दर्शन हुए और उन्होंने अपनी हार्दिक व्यथा उन संत को कह सुनाई संत ने शरणागत जानकर लोधीरम को पुत्र रत्न की प्राप्ति का वरदान दिया और कहा ''साबरमती नदी में तैरते कमल पत्र पर शयन करते बालक को अपने घर ले आना, वही तुम्हारा पुत्र होगा।'' पुत्र प्राप्ति की कामना लेकर श्री लोधीरम ब्राहमण साबरमती नदी के तट पर गए जहाँ उन्हें पानी पर तैरते कमल पर लेटा हुआ बालक प्राप्त हुआ इस प्रकार शुभमिति फाल्गुन शुक्ल अष्टमी गुरुवार के दिन विक्रम संवत 1601 में संत शिरोमणि सदगुरु श्री दादू दयाल जी महाराज का 'अवतार' हुआ।
Saint Shri Dadu Dayal Ji Maharaj
अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु परोपकार के लिए तुरंत दे देने के स्वाभाव के कारण उनका नाम 'दादू' रखा गया आप दया दीनता करुणा के खजाने थे, क्षमा शील और संतोष के कारण आप 'दयाल' अतार्थ "दादू दयाल" कहलाये विक्रम सं. 1620 में सब प्रकार से घर को छोड़कर आप केवल प्रभु चिंतन में ही लीन हो गए अहमदाबाद से प्रस्थान कर भ्रमण करते हुए राजस्थान की आबू पर्वतमाला, तीर्थराज पुष्कर से होते हुए करडाला धाम (जिला जयपुर) पधारे और पूरे 6 वर्षों तक लगातार प्रभु की साधना की। दादू जी महाराज की कठोर साधना से इन्द्र को आशंका हुई की कहीं इन्द्रासन छीनने के लिए तो वे तपस्या नहीं कर रहे , इसीलिए इंद्र ने उनकी साधना में विघ्न डालने के लिए अप्सरा रूप में माया को भेजा जिसने साधना में बाधा डालने के लिए अनेक उपाय किये मगर उन महान संत ने 'माया में' 'अपने में' एकात्म दृष्टि से बहन और भाई का सनातन प्रतिपादित कर, उसके प्रेमचक्र को एक पवित्र सूत्र से बाँध कर शांत कर दिया
संत दादू जी विक्रम सं. 1625 में सांभर पधारे यहाँ उन्होंने मानव - मानव के भेद को दूर करने वाले, सच्चे मार्ग का उपदेश दिया। तत्पश्चात दादू जी महाराज आमेर पधारे तो वहां की सारी प्रजा और राजा उनके भक्त हो गए उसके बाद वे फतेहपुर सीकरी  भी गए जहाँ पर बादशाह अकबर ने पूर्ण भक्ति भावना से दादू जी के दर्शन कर उनके सत्संग उपदेश ग्रहण करने की इच्छा प्रकट की तथा लगातार 40 दिनों तक दादूजी से सत्संग करते हुए उपदेश ग्रहण किया। "दादूजी के सत्संग प्रभावित होकर अकबर ने अपने समस्त साम्राज्य में गौ-हत्या बंदी का फरमान लागू कर दिया "
उसके बाद दादूजी महाराज नरेना (जिला जयपुर) पधारे और उन्होंने इस नगर को साधना, विश्राम तथा धाम के लिए चुना और यहाँ  एक खेजडे के वृक्ष के नीचे विराजमान होकर लम्बे समय तक तपस्या की और आज भी "खेजडा जी" के वृक्ष के दर्शन मात्र से 'तीनो प्रकार के ताप' नष्ट होते हैं यहीं पर उन्होंने ब्रह्मधाम "दादूद्वारा" की स्थापना की जिसके दर्शन मात्र से आज भी सभी मनोकामनाए पूर्ण होती है
तत्पश्चात श्री दादूजी ने सभी संत शिष्यों को अपने 'ब्रह्मलीन' होने का समय बताया। ब्रह्मलीन होने के लिए निर्धारित दिन (जयेष्ट कृष्ण अष्टमी सम्वत 1660 ) के  शुभ समय में श्री दादूजी ने  एकांत में ध्यानमग्न  होते हुए "सत्यराम" शब्द का उच्चारण कर इस  संसार से ब्रहम्लोक को प्रस्थान किया।
उनके उपदेशों को उनके शिष्य रज्जब जी ने "दादू अनुभव वाणी" के रूप में समाहित किया, जिसमे लगभग 5000 दोहे शामिल हैं।
श्री दादू दयाल जी महाराज के द्वारा स्थापित "दादू पंथ" "दादू पीठ" आज भी मानव मात्र की सेवा में निर्विघ्न लीन है। वर्तमान में दादूधाम के पीठाधीश्वर के रूप में आचार्य महंत श्री गोपालदास जी महाराज विराजमान हैं। वर्तमान में भी प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल अष्टमी पर नरेना धाम में भव्य मेले का आयोजन होता है तथा इस अवसर पर एक माह के लिए भारत सरकार के आदेश अनुसार वहां से गुजरने वाली प्रत्येक रेलगाड़ी का नरेना स्टेशन पर ठहराव रहता है।
संतप्रवर श्री  दादू दयालजी  महाराज को 'निर्गुण' संतो जैसे की कबीर गुरु नानक के समकक्ष माना जाता  है तथा उनके उपदेश दोहे आज भी समाज को सही राह दिखाते रहे हैं।
"सागर-सम दादू चरित्र, वार पार नहीं अंत
पद्य-गद्य गागर भरी, धारहिं भक्त सुसंत ।।"

 - साकेत गर्ग

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Saturday, February 14, 2015

Views on Delhi Election Results

बीजेपी के लिये 'हार' नहीं 'उपहार' है दिल्ली के नतीजे

       आखिर इस वैलेंटाइन डे यानी 14 फ़रवरी 2015 को अरविन्द केजरीवाल को वह कुर्सी फिर मिल ही गई, जिस कुर्सी से उन्होंने पिछले साल गत वैलेंटाइन डे पर बड़ी बेरुखी से तलाक ले लिया था। 10 फरवरी को आये दिल्ली चुनावों के अप्रत्याशित व ऐतिहासिक नतीजों ने अरविन्द केजरीवाल को भारतीय राजनीति का नया हीरो साबित कर ही दिया। लेकिन जितनी चर्चा अरविन्द केजरीवाल व आम आदमी पार्टी की ऐतिहासिक जीत की नहीं हुई, उससे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी कि हार की हुई। 
        यूँ तो, इन चुनावो में कांग्रेस को तो एक सीट तक भी नहीं मिली। बावजूद इसके, न केवल भारतवर्ष में बल्कि दुनिया भर की मिडिया में प्रधानमंत्री मोदी व उनकी भारतीय जनता पार्टी की बुरी हार की ही चर्चायें होती रही। और होनी लाज़मी भी है साहब। ज्यादातर विरोधी पार्टियों, पत्रकारों इत्यादि ने इन चुनावों को बीजेपी की हार के रूप में ही देखा। 
       मगर, मैं इन चुनावी नतीजों को बीजेपी व प्रधानमंत्री मोदी की 'हार' नहीं मानता, बल्कि इन चुनावी नतीजों को मैं उनके लिये एक 'उपहार' मानता हूँ। उपहार? जी हाँ, जनता की तरफ से दिया गया उपहार। अंहकार से बचने की सीख का उपहार, अजय होने के दंभ से बचने का उपहार, जनता को दिखाये गये सपनों को (अब तो) हकीकत की ओर ले जाने का उपहार, बेलगाम नेताओ पर लगाम लगाने का उपहार, लोकसभा चुनाव के 9 महीने बाद भी सिर्फ लहर या सुनामी के भ्रम में फंसे रहने से बचने का उपहार, नौ महीने बीतने पर भी आम जनता को कोई ठोस राहत न मिलने पर आँखें खोलने का उपहार, आत्मविश्लेषण करने का उपहार। 
       एक बात तो है, 'हार' हो या 'उपहार', कुछ भी 'ऐसे ही' तो नहीं मिलता। कोई न कोई सॉलिड कारण तो होता ही है, बॉस। यहाँ क्या कारण है ? एक नहीं शायद कईं कारण है। ज़रा गौर फरमाइये, आपको जो कारण पसंद आये छाँट लीजिये और हमे भी ज़रूर बताइये। कारणों की लिस्ट आपके निरिक्षण के लिये हाज़िर है श्रीमान- सिर्फ एक राज्य का चुनाव होना, नेगेटिव व्यक्तिगत टिपणियाँ करना, चुनावी घोषणा पत्र की जगह विजन डॉक्यूमेंट लाना, नौ लाख का या पता नहीं कितने हज़ार या कितने लाख का खुद का नाम लिखा सूट, सामने वाले का मफ़लर और खांसी, बेलगाम नेताओं की अनर्गल बयानबाज़ी, चार बच्चे कभी पाँच बच्चे पैदा करने की सीख, केजरीवाल को नक्सलियों के साथ जंगल में जाने की सीख, उपद्रवी गोत्र, रामजादे….., खुद को खुशनसीब दूसरों को बदनसीब कहना, विज्ञापन में जीते-जी अन्ना की कार्टून फोटो पर हार टाँकना, अलवर में पुल का नाथूराम गोंडसे पर नामकरण, पार्टी व सरकार में शामिल लोगों द्वारा धर्म की राजनीति करने पर भी 'साइलेंट' रहना, अपनी लहर के बाद किसी और की आँधी-सुनामी आना, अहंकार या ओवर-कॉन्फिडेन्स जैसा कुछ, काले धन का आना-जाना, खाते में 15 लाख रुपये जमा कराने के चुनावी वादे को चुनावी जुमला कहकर पिंड छुड़ाना, वोटर से किये गये चुनावी वायदे का मज़ाक बनाना, सरकार बनने के नौ महीने बाद भी राहत, आम जनता की मूल-भूत समस्याओं और महँगाई का हाल-चाल, हर किसी को चाहे वो कितना भी धुर-विरोधी रहा हो या रही हो, अपनी पार्टी में ले कर असली कार्यकर्ताओं के दिल को ठेस पहुँचाना, चंद दिनों पहले पार्टी में आई महिला को वरिष्ठ से वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की सेवा व मेहनत को धत्ता बताकर सीधे मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना, इत्यादि-इत्यादि। 
       खैर, अब चाहे आप मेरी बात से सहमत हो या ना हों, किसी को 'हार' मिले या 'उपहार' मिले। मगर, दिल्ली के नतीज़ों ने यह साबित कर दिया की एक बार फिर से जीता इस देश का लोकतंत्र ही है। और यही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की खूबी भी है, "जहाँ जनता कभी-भी किसी-भी 'रंक' को 'राजा' बना देती है और गद्दी पर बैठे 'राजा' को तख़्त से उतार भी देती है।" 
                                  जय हिन्द !         
 - साकेत गर्ग

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Saturday, December 6, 2014

बिग बॉस सीजन 8 को है मेक -ओवर की सख्त ज़रूरत

बिग बॉस सीजन 8 को है मेक-ओवर की सख्त ज़रूरत

        इंडियन टेलीविजन के सबसे बड़े रियलिटी शो बिग बॉस के आठवें सीजन को शुरू हुए 75 दिनों से ज्यादा हो चुके हैं। मगर, अभी तक बिग बॉस के फैंस को इस सीजन में 'वो बात' नज़र नहीं आ रही, जिसके लिए बिग बॉस सीरियल फेमस है। 'वो बात' मतलब- फुल्टू एंटरटेनमेंट, एन्जॉयमेंट, लाफ्टर, एक्साइटमेंट और अटैचमेंट।
       इस सीजन की शुरुआत 21 सितम्बर को बड़े ही अलग अंदाज़ में एक हवाई जहाज यात्रा की थीम के साथ हुई थी। दर्शकों को उम्मीद थी की इस बार का सीजन पिछले सीजन्स के मुकाबले बेहतर रहेगा। शो के होस्ट सलमान खान ने भी कहा था, "यह सफर होगा मस्त, ट्विस्ट होंगे ज़बरदस्त" मगर, दर्शकों की आशाओं ने पहले ही हफ्ते में दम तोड़ दिया। 'एयर प्लेन क्रैश साईट' की थीम व 'सीक्रेट सोसाइटी' भी दर्शकों को एंटरटेनमेंट नहीं दे पाई और इन दोनों ही थीम्स को हटा दिया गया। दर्शकों को लगा शायद बिग-बॉस के घर में आ जाने के बाद शो कुछ 'पिक' करेगा, मगर ऐसा भी नहीं हो पाया।



       बिग बॉस के द्वारा दिए जाने वाले 'लग्जरी बज़ट टास्क' व बाकि दूसरे 'टास्क' भी दर्शको का मनोरंजन करने में असफल ही रहे। हाँ, कुछ एक-दो टास्क ज़रूर कुछ जिज्ञासा व आशाऐं पैदा कर पाये, मगर ज्यादातर टास्क उबाऊ ही लगे। हालाँकि, बिग बॉस और 'कलर्स चैनल' की टीम ने इस सीजन को मसालेदार बनाने की पूरी कोशिश की, मगर उनकी इस कोशिश को इस बार शो में भाग ले रहे घरवालों ने पूरी तरह धो डाला।
घर में रह रहे ज्यादातर घरवाले बोरिंग, आलसी व फीके ही नज़र आये। साथ ही, कुछ  घरवाले तो बिस्तर, कम्फर्ट, खाना व मेकअप के मोह में ही फंसे नज़र आते रहे। हालांकि, कुछ घरवाले जैसे गौतम, पुनीत, अली, प्रीतम और करिश्मा दर्शकों का कुछ मनोरंजन कर पा रहे हैं, मगर वो इस लेवल का नज़र नहीं आ रहा, जिसके लिए दर्शक रोज़ एक घंटा निकाल सकें, वो भी प्राइम टाइम पर।
      ज्यादातर घरवालों के एंटरटेनमेंट, एन्जॉयमेंट, लाफ्टर, एक्साइटमेंट और अटैचमेंट (दर्शकों के दिल के साथ अटैचमेंट) लेवल पर फ़ेल हो जाने के बाद दर्शकों की सारी उम्मीदें 'वाइल्ड कार्ड एंट्रीज़' पर टिक गई। पिछले कुछ सीजन्स में देखा भी गया है की वाइल्ड कार्ड एंट्रीज़ के बाद बिग बॉस का शो एकदम पिक-अप कर लेता है। मगर, इस केस में भी दर्शकों को निराशा ही ज़्यादा हाथ लगी और आलम यह रहा की 4 में से 2 वाइल्ड कार्ड एंट्रीज़ एक-दो हफ्तों में ही बाहर हो गयी।
       पहले बिग बॉस सीजन 8 की थीम ने दर्शकों को निराश किया, उसके बाद ज्यादातर घरवालों ने निराश किया और रही-सही कसर वाइल्ड कार्ड एंट्रीज़ ने पूरी कर दी।
यहाँ, यह कहना गलत नहीं होगा की बिग बॉस सीज़न 8 के अभी तक चलने में सबसे बड़ा कारण इस शो के होस्ट सलमान खान और उनका 'वीकेंड का वार' ही हैं । यानी, वीकेंड पर सलमान आते हैं, एंटरटेनमेंट लाते हैं और बाकी वीकडेज़ पर दर्शक बोर हो जाते हैं। तो क्या इस बार का बिग बॉस 8 इसी तरह बिना दर्शको को खुश किये ही गुज़र जाएगा।
         चलिये, बिग बॉस के पहले ही सीजन से फैन होने के नाते हम ही बिग बॉस और कलर्स चैनल की टीम को कोई 'रामबाण' आईडिया दे देते हैं। इस सूरत-ए-हाल में तो इस सीजन की डूबती नाव को बचाने के लिए एक ही उपाय नज़र आता है - बिग बॉस सीजन 6 के रनर अप 'इमाम सिद्दीकी'
        बिग बॉस 6 में ना केवल इमाम ने दर्शकों का फुल्टू एंटरटेनमेंट किया था, बल्कि दर्शकों के दिल में भी जगह बनायीं थी। कौन भूल सकता है इमाम का 'टाइम आउट' कहना, 'चलो बोलो लंदन' कहना, रंग-बिरंगे कपडे पहनना, बचे हुए ठन्डे खाने को फेंक कर उसका अनादर करने की जगह खुद उसे री-यूज़ करना, चमच्च से दिवार पर छवि उकेरना, घर में अकेले पड़ने व सब घरवालों के अपने खिलाफ हो जाने के बावज़ूद दर्शकों का पूरा मनोरंजन करना और सबसे बढ़कर घरवालों की 'कुंडली जागृत' करना। सच में, अगर यहाँ यह कहा जाए की इमाम बिग बॉस के आजतक के इतिहास में सबसे ज्यादा फ़ेमस व फुल्टू असली एंटरटेनमेंट करने वाले कंटेस्टेंट हैं, तो इस में कोई दो राय नहीं होगी।


Imam Siddique in Bigg Boss Season 6
         इसलिए, इस सीजन के गिरते एंटरटेनमेंट स्तर को सुधारने के लिए इमाम को बिग बॉस 8 में भी एक बार कुछ दिनों के लिए ज़रूर लाया जाये। यदि, इमाम को बिग बॉस 8 में लाया जाता है तो यह देखना मज़ेदार, एक्साइटिंग व एंटरटेनमेंट से भरपूर होगा की इमाम किस तरह इस सीजन के बोरिंग घरवालों की 'कुंडली जागृत' करके न केवल उनमे बल्कि पूरे शो एक नयी ऊर्ज़ा व जान भरते हैं। पूरा विश्वास है की यदि इमाम को बिग बॉस सीजन 8 में शामिल किया जाता है तो पूरा शो पहले से कहीं ज़्यादा मनोरंजक व एक्साइटिंग बन जाएगा। इन शॉर्ट, पूरे शो का 'मेक-ओवर' हो जाएगा।
        अब बस देर है बिग बॉस व कलर्स चैनल की टीम तक हमारी बात पहुँचने का। उसके बाद तो सिर्फ 'चलो बोलो एंटरटेनमेंट'

- साकेत गर्ग

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Wednesday, February 19, 2014

आमिर खान के बचाव में खुलकर सामने आये धर्मेश दर्शन

यूँ तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर चर्चित हस्तियों का मज़ाक बनाना व उनके बारे में मनगंढ़त बातें करना इन दिनों आम होता जा रहा है। मगर कईं बार कुछ शरारती तत्व जानी-मानी हस्तियों के चरित्र पर टिप्पणी करने तक से बाज नहीं आते। ऐसा ही कुछ वाक्या पिछले दिनों अभिनेता आमिर खान (Aamir Khan) के साथ हुआ। बीते वैलेंटाइन डे के मौके पर एक सोशल नेटवर्किंग साईट पर कुछ लोगो ने आमिर खान के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा कि, "आमिर अपनी फिल्मों में परफेकशन के नाम पर (जान-बूझकर) बार-बार रिटेक लेकर अपनी अभिनेत्रियों का शोषण करते हैं।" यहाँ पर खासकर नब्बे के दशक कि ब्लॉकबस्टर फ़िल्म राजा हिन्दुस्तानी में आमिर और करिश्मा कपूर (Karishma Kapoor) पर फिल्माये गये चर्चित 'किसिंग सीन' (Kissing Scene) का हवाला देते हुए यह कहा गया कि इस सीन के लिए आमिर ने जान-बूझकर 21 रिटेक लिये थे।
मगर इससे पहले कि मामला ज्यादा तूल पकड़ता तथा आमिर के चरित्र पर उँगलियाँ उठना शुरू होती, प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक धर्मेश दर्शन (Dharmesh Darshan) खुलकर आमिर के बचाव में सामने आ गये। ग़ौरतलब है की निर्देशक धर्मेश दर्शन ने ही अपनी फ़िल्म राजा हिन्दुस्तानी में यह किसिंग सीन आमिर और करिश्मा पर फिल्माया था।




लेखक की धर्मेश दर्शन से हुई बातचीत में उन्होंने साफ़ कर दिया की इस मनगढंत बात में रत्ती-भर भी सच्चाई नहीं है। इस फ़िल्म का निर्देशक होने के नाते उन्हें इस तरह कि बातें सुनकर दुःख महसूस हुआ तथा उन्होंने सच्चाई को सबके सामने लाने की ठान ली। श्री दर्शन ने यह साफ़ करते हुऐ मुझे बताया कि "रिटेक लेना या नहीं लेना पूरी तरह से एक निर्देशक की परिकल्पना का विषय है। और आमिर ने राजा हिन्दुस्तानी की शूटिंग के दौरान एक बार भी रिटेक कॉल नहीं किया था। निर्देशक ही यह तय करते हैं की एक और टेक कि जरुरत है या नहीं। और इसके पीछे कईं मापदंड व कारण होते हैं जैसे अभिनेता, लाइट की उपलब्ता, कैमरा एंगल, मौसम परिवर्तन इत्यादि।
 जब मैंने ने उनसे पूछा कि "क्या कभी कोई अभिनेता ऐसा कर सकता है?" तो इसका जवाब देते हुऐ उन्होंने कहा "मेरे हिसाब से कोई भी इमान्दार अभिनेता केवल मस्ती या गलत भावना से ऐसा नहीं कर सकता और यह एक निर्देशक पर निर्भर करता है कि वो अपनी फ़िल्म के सेट पर कैसा माहौल बनाये रखे - ईमानदारी से काम करने का या फिर बेवजह खेलकूद का।" 
अंत में मेरे इस सवाल "आपने कम मगर राजा हिन्दुस्तानी, लुटेरा, धड़कन, बेवफ़ा जैसी यादगार फिल्में बनाई हैं, क्या आपके प्रशंसक आपको जल्द ही निर्देशक के रूप में एक बार फ़िर देख पायेंगे?" का जवाब देते हुए श्री धर्मेश दर्शन ने कहा, "मैंने प्रयास करके कम मगर ज़्यादातर बड़ी और अच्छी फिल्में करने कि कोशिश की है। बदलते माहौल में जब तक मुझे इस बात का हौसला ना मिले की मैं अपने स्टैंडर्ड्स को कायम रख सकूंगा, तब तक मैं किसी भी फ़िल्म को अपना नाम न देने कि कोशिश करता रहूँगा। मुझे यकीन है कि मेरे प्रशंसक मुझे अपने अच्छे काम के लिए हमेशा याद रखेंगे।"
आशा है कि खुद निर्देशक धर्मेश दर्शन से सच्चाई जानने के बात प्रशंसक आमिर खान के बारे में ऐसी मनगढंत बातों पर विश्वास नहीं करेंगे।
 - साकेत गर्ग 

Thursday, October 17, 2013

Views On Ratangarh (MP) Devi Temple Stampede

आखिर कब तक हम भगदड़ में पिसते रहेंगे?

पिछले रविवार यानि नवरात्रि पर्व के अन्तिम दिन को मध्यप्रदेश के दतिया जिले में रतनगढ स्थित देवी मन्दिर में भगदड (Stampede) मचने से 100 से ज्यादा श्रद्धालुओं की मृत्यु हो गई जबकि 200 से अधिक श्रद्धालु घायल हो गए। इस दुखद घटना से पूरे देश में शोक की लहर दौड पडी और त्यौहार व हर्षोल्लास का माहौल सदमे व अघात में तब्दील हो गया। हर वर्ष नवरात्रि के पावन पर्व पर बडी संख्या में श्रद्धालु रतनगढ माता मन्दिर में दर्शन करने पहुंचते है। फिर भी वहां ऐसे हादसों को रोकने के लिए पर्याप्त उपाय उपलब्ध नहीं थे और यही हाल हमारे देश के लगभग ज्यादातर मन्दिरों, देवस्थानों, दरगाहों, धार्मिक मेलों व पर्यटन स्थलों आदि का है।
हर साल हमारे देश के किसी न किसी कोने में कितने ही निर्दोष व मासूम लोग भगदड के शिकार होकर मर जाते है। सरकार मरने वालो के आश्रितों को आर्थिक मदद व मुआवजा देकर खानपूर्ति कर लेती है तथा न्यायिक जांच के आदेश देकर अपनी जिम्मेदारी व कमजोरी से पल्ला झाड लेती है। आप और हम यह कहते हुए अखबार समेट कर रख देते है कि "यह तो होना ही था आजकल कितनी ज्यादा  भीड़ होने लग गई है, सबको जल्दी है"।
हर बार जनता यही सोचती है कि "अब की बार सरकार जरूर कुछ करेगी"। सरकार सोचती है कि "अब देवस्थानों व मन्दिरों को सम्भालने व चलाने वाली संस्थाए जरूर कुछ करेगी" और संस्थाऐ सोचती है "इस बारे में सरकार कोई सुझाव देकर अमल करेगी और आने वाली जनता ज्यादा सावचेत व जागरूक रहेगी"। आप और हम चाहें कुम्भ के मेले में जाएँ, जगन्नाथपुरी जायें, ख्वाजा गरीब नवाज के उर्स में जाये या तिरूपति बालाजी के दर्शन को जाये, भीड में कहीं न कहीं भगदड के विचार भर से ही हम डर व सहम जाते है। फिर भी हम कैसे भी एक-दूसरे को धक्का देकर या गच्चा देकर जल्दी से जल्दी भीड़ से निकलना चाहते है।
इन स्थानों पर व ऐसे आयोजनों में भगदड मचने का कारण कुछ भी हो सकता है जैसे कि भीड का जल्दबाजी करना बेकाबू होना, अफवाह फैलाना या धक्का-मुक्की होना इत्यादि। अगर हम ज्यादातर भगदड के हादसों पर नजर डालेगे तो पायेंगे की इन दुखद हादसों को "भीड नियंत्रण" (Crowd Management) की कई आसान परन्तु सहीं तकनीकों का इस्तेमाल करके रोका जा सकता था। इस 'रोका जा सकता था'  को 'रोका जा सकता है', में बदलने के लिए व ऐसे दुखद हादसों की पुनारावृति को रोकने के लिए जरुरी है कि हमें यानि की "गण" व साथ ही "तंत्र" को भीड नियंत्रण की सही तकनीकों (Crowd Management Techniques) का इस्तेमाल करना होगा। 
        सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा की भगदड को रोकने और उसके प्रभाव को कम से कम करने के लिए भीड नियंत्रण की सही तकनीकों का इजाद, इस्तेमाल व प्रचार प्रसार हो। आयोजनकर्ताओं, संस्थानों व देवस्थानों को चलाने वाले बोर्डो व ट्रस्टों को सुनिश्चित करना होगा कि वे अपने कार्यक्रमों व स्थानों में भीड नियंत्रण की सही तकनीकों का उचित इस्तेमाल करें। जैसे कि भीड नियंत्रण के लिए अलग से कुशल कार्यकत्र्ताओं की फौज बनाऐ, पर्याप्त मात्रा में व सही तरीके से बैरियर्स व बैरिकेड्स लगायें, भीड पर नजर रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में कैमरे व ऊंचे स्थानों पर कार्यकत्र्ताओं का इस्तेमाल करें, लाऊड स्पीकरों का इस्तेमाल कर भीड़ को जरूरी निर्देश दें व नियंत्रित करे और जनता को यानि कि हमें और आप को चाहिए की हम भीड में जल्दबाजी न करें, एक-दूसरे के साथ धक्का-मुक्की न करें, किसी भी अप्रीय घटना होने पर एकदम न भागें और भीड-भीड में अपने गुस्से का तापमान न बढने दें।
आप और हम यानि कि हम सब भी भीड़ का हिस्सा है। इसलिए भगदड जैसी दुखद घटना से बचने के लिए व ऐसे दुखद हादसों कि पुर्नावृति रोकने के लिए हमें भी सरकार व संस्थाओं के साथ मिलकर जरूरी अहतियात बरतने होंगे। 
        इसी आशा के साथ अंत करता हूं कि अब एक नई शुरूआत होगी भगदड मुक्त भारत कि ताकि -
"हमें भीड़ में डर न मिले, मौत न मिले।
मिले तो सिर्फ खुशी मिले, उल्लास मिले।"
 साकेत गर्ग 

Thursday, September 12, 2013

AJMER "AIR" PORT अजमेर 'हवाई' अड्डा

अजमेर 'हवाई' अड्डा

कल शाम पडोस में रहने वाला गोरू हामारे पास आया और बोला "भईया हिन्दी में एक 'ऐसे' (Essay) लिख दो।" हमने उसे कहा भाई, हमें हिन्दी में 'ऐसे' लिखना तो नहीं आता, मगर हां हिन्दी में 'निबन्ध' लिखना जरूर आता है। उसने कहा वही लिख दो। हमने विषय पूछा तो उसने कहा किसी भी हवाई अड्डे पर लिख दो। अब, जब हवाई अड्डे पर ही निबन्ध लिखना था तो हम भला किसी और हवाई अड्डे के बारे में क्यों लिखते? हमने निबन्ध हमारे 'अजमेर हवाई अड्डे' पर लिखने की ठानी और फुल टाईट होकर रात-भर में ही अजमेर ’हवाई’ अड्डे पर एक तडकता-भडकता निबन्ध दे मारा। निबन्ध तो बहुत बढिया था और हमे पूरा यकिन था कि गोरू हमारा फैन हो जायेगा। मगर, हाय री किस्मत पता नहीं क्या हुआ, लेकिन गोरू को उस निबन्ध के कारण स्कूल से निकाल दिया गया और उसकी मम्मी ने उसे मुझसे 100 फीट दूर रहने कि कसम दिला दी। पता नहीं लोग मेरे 'टेलेन्ट' से इतना जलते क्यो है? खैर, उन्हें छोडे, आप ही मेरे निबन्ध पर गौर फरमाये और मेरे टेलेन्ट का गुण गायें।
अजमेर ’हवाई’ अड्डा। अजमेर हवाई अड्डा एक बहुत ही सुन्दर विशाल व पुराना हवाई अड्डा है। यह हवाई अड्डा राजस्थान कि धरती पर अजमेर शहर में स्थित है। इस हवाई अड्डे का शिलान्यास कब हुआ इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी तो नहीं है मगर इतिहासविद् बताते है कि इस हवाई अड्डे कि नींव अजमेर के राजस्थान में विलय के समय ही रख दी गई थी।
अजमेर 'हवाई' अड्डे पर पिछले पांच-छह दशको से हवाई बातो, हवाई वायदो, हवाई घोषणाओ, हवाई प्रोजेक्टो और हवाई सपनों की फ्लाईट्स नियमित व निर्विघ्न रूप से आती-जाती रहती है। अजमेर शहर को हवाई बातों का हवाई अड्डा होने के कारण ही अजमेर इवाई अड्डा कहा जाने लगा है। अजमेर हवाई अड्डे कि सबसे खास व आकर्षक बात यह है कि यहां से टेक-ऑफ करने वाली ’हवाई’ फ्लाईट कहीं भी लैण्ड नहीं करती  और यहां लैण्ड करने वाली ’हवाई’ फ्लाईट कभी-भी टेक-ऑफ नहीं करती पाती। यही खासियत अजमेर हवाई अड्डे को बाकी हवाई अड्डो से अलग व मजेदार बनाती है।
AJMER "AIR" PORT - कृपया ध्यान दें - यहाँ केवल "हवाई" बातों की फ्लाइट्स ही आती और जाती है।This Picture Is Imaginary And Is Solely  For Entertainment Purpose Only
अजमेर हवाई अड्डे कि इस खासियत का असली कारण तो पता नहीं हैं। मगर समझदार व जानकार कहते हैं कि ऐसा इस अजमेर ’हवाई’ अड्डे की आबो-हवा के "केमिकल लोचे" के कारण हैं, कुछ तर्कशास्त्री इसका श्रेय अजमेर के होनहार व बलवान राजनेताओं को भी देते है। हांलाकि असली कारण जानने के लिए आज भी कई विश्वविद्यालयों में "रिसर्च-वर्क" चल रहा है। 
अजमेर हवाई अड्डे कि पहली हवाई फ्लाईट का नाम "राजधानी" था। कहा जाता है अगर यह हवाई फ्लाईट समय रहते टेक ऑफ कर लेती तो अजमेर राजस्थान की राजधानी बन जाता। किवंदिती है कि - आज भी कई बार यह फ्लाईट कुछ सिरफिरो को हवा में उडती नजर आ जाती है। राजधानी फ्लाईट के जस्ट बाद यहां पर "शिक्षा नगरी फ्लाईट" को लैण्ड करना था, मगर अजमेर के नेटवर्क ऐरिया में "शोर्ट सर्किट" होने के कारण यह फ्लाईट, क्रैश हो गई। आज भी इस दर्दनाक हादसे के कई निशान बाकी है। इन दोनो फ्लाईट के बाद से ही अजमेर हवाई अड्डे पर रोजाना सैंकडो फ्लाईट नियमित रूप से लैण्ड व टेक ऑफ करती है। शुरूआत में कुछ अजमेरियों को इन फ्लाईटस् के शोर से जलन भी होती थी, मगर समय के साथ-साथ उन्हें भी इनकी आदत-सी हो गई। कहा जाता है कि अब तो हर दूसरे अजमेरी को इन फ्लाईटस् कि लत लग चुकी है।
कुछ वर्षो पहले अजमेर हवाई अड्डे पर "बीसलपुर फ्लाईट" कि सेवाएँ भी शुरू की गई थी, मगर भला हो हमारे अजमेर के दिलेर राजनेताओं का उन्होने बहुत मेहनत कर इस बीसलपुर फ्लाईट को जयपुर "डायर्वट" करवा दिया। वैसे कुछ सालो से अजमेर हवाई अड्डे पर "चम्बल का पानी फ्लाईट" के उतरने के भी कयास लगाये जा रहे है, मगर यह फ्लाईट एक बार टेक- ऑफ करने के बाद से आज तक वापस दिखी नहीं है। दो तीन साल पहले अजमेर हवाई अड्डे पर "सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी" नामक फ्लाईट भी उतरी थी मगर सशक्त राजनीतिक नेतृत्व के कारण इस फ्लाईट को जयपुर बान्दरसीन्दरी डायवर्ट कर दिया गया। अजमेर से लगभग 35 किलोमीटर दूर होने के बाद भी अजमेर "हवाई" अड्डे की याद में इसका नाम अजमेर सैन्ट्रल यूनिवर्सिटी रख दिया गया।
अजमेर हवाई अड्डा दुनिया का इकलौता ऐसा "हवाई" अड्डा है जहां पर "रेल्वे फ्लाईट्स" का भी आना-जाना होता है। हांलाकि आजकल केवल जाना-जाना हो रहा है। अभी कुछ ही दिनों पहले यहां से "रेल्वे टिकिट प्रिंटिंग प्रेस" नामक फ्लाईट कि सेवाएँ बन्द कर दी गई थी, इसका भी सारा श्रेय अजमेर के होनहार राजनेताओं को ही दीया जा सकता है। अजमेर में रेल्वे के 'हवाई' सफर के इतिहास कि सबसे महत्वपूर्ण फ्लाईट "वर्ल्ड क्लास स्टेशन" फ्लाईट है। यह फ्लाईट कुछ वर्षो पहले दिल्ली से यहां आकर लैण्ड हुई थी, मगर आज तक वापस टेक ऑफ नहीं कर पायी। ऐसा माना जाता है कि अगर यह फ्लाईट एक बार टेक ऑफ कर जाये तो इससे अजमेर का भला हो जायेगा। शायद इसिलिए यह फ्लाईट अजमेर 'हवाई' अड्डे से टेक ऑफ नहीं कर पा रही है। 
पिछले लगभग दो दशको से अजमेर से "ऐयरपोर्ट" नामक 'हवाई' फ्लाईट भी नियमित रूप से टेक ऑफ कर रही है, मगर यह फ्लाईट आजतक कहीं भी लैण्ड नहीं कर पायी है। हालांकि अब तो बताया जाता है कि 'लैण्ड' का सौदा हो गया है और 'पायलट' इसे  लैण्ड कराने वाले है। ऐसी भ्रामक खबरे पिछले दो दशको में कई बार सुनी जा चुकी है। इसलिए भयभीत ना हों। पिछले दो सालो में अजमेर हवाई अड्डे से "ऐलिवेटिड रोड" नामक फ्लाईट भी कई बार टेक ऑफ कर चुकी है, मगर यह फ्लाईट अजमेर के नेटवर्क ऐरिया से बाहर जाते ही हवा में ही गायब हो जाती है। कई बार तो यह फ्लाईट टेक ऑफ होते हुए भी क्रैश हो चुकी है। 'लेखक' खुद इस खतरनाक फ्लाईट के 'क्रू मेम्बर' है और अब 'नौकरी' छोडने का मन बना रहे है।
अजमेर 'हवाई' अड्डे का ज्यादातर स्टाफ राजनीतिक है। गौरतलब है कि अजमेर के राजनीतिज्ञ हवाई कारनामों के लिए वर्ल्ड फेमस है। ना केवल कई देशो व प्रान्तों के बल्कि "दूसरे ग्रहो के भी प्राणी" आकर अजमेर के हवाई राजनीतिज्ञों से हवाई कारनामों कि ट्रेनिंग लेते रहे है। कहा जाता है कि अजमेर हवाई अड्डे व अजमेर के हवाई राजनीतिज्ञों के सम्मान में बहुत ही जल्द एक 'हवाई विश्विद्यालय' भी खुलने जा रहा हैं, जहां पर नौसिखिए लोग अजमेर के हवाई राजनीतिज्ञों से 'हवाई' ज्ञान प्राप्त कर पायेंगे।
अजमेर 'हवाई' अड्डे का 'रनवे' पूरा अजमेर शहर है। अजमेर शहर के किसी भी गली-मौहल्ले, सडक-मकान, दुकान-थडी, कार्यालय-भवन पर कभी-भी कोई भी 'हवाई' फ्लाईट लैण्ड व टेक ऑफ कर जाती है। अजमेर शहर के समस्त नागरिक आये दिन इन हवाई फ्लाईटस् का भरपूर आनन्द उठाते है।
अजमेर हवाई अड्डे कि ज्यादातर हवाई बातों, हवाई वायदों व हवाई घोषणाओं के क्रैश होने व हवा में उड जाने के कारण कई बार अजमेर शहर की छाती पर गहरे-गहरे घाव व जख्म भी हो जाते है। इनमें से ज्यादातर तो अन्दरूनी व अद्रश्य होते है, मगर यह सारे जख्म अजमेर की साख व संस्कृति को गहरा नुकसान पहुंचाते है। इन सभी इवाई कारनामों के कारण अजमेर अपने समकक्ष व अपने से भी छोटे शहरों से पिछडता जा रहा है। मगर आप इस सब की परवाह ना करें और इस 'हवाई' सफर का बिना सोचे-समझे मजा उठाते रहे।

- साकेत गर्ग